Success Story

Success Story : 1

फूलों की खेती आय का अच्छा माध्यम

कृषक का नाम : श्री शिवशंकर पटेल

गाॅव का नाम : राजपुर

विकास खण्ड : अराजीलाइन, वाराणसी

जनपद : वाराणसी

विकसित तकनीकी का उपयोग :

वाराणसी जनपद में फूलों की मांग को देखते हुए केन्द्र के वैज्ञानिकों ने कृषकों को अमरूद के बाग में ग्लेडूलस की खेती करने की सलाह दी जिससें खाली पड़ी जमीन का उपयोग हो सकें एवं बाग में अवांछित खरपतवार व कीट न पनपने पायें। जनपद के विकास खण्ड अराजीलाइन के राजपुर ग्राम के श्री शिवशंकर पटेल ने केन्द्र द्वारा अंन्तः शस्य फसल के अन्तर्गत के बाग में ग्लेडूलस की खेती को अपनाया है। श्री शिवशंकर पटेल के पास अपनी 03 हेक्टेयर सिंचित जमीन है, जिसमें 1.5 हेक्टेयर जमीन पर अमरूद का बाग लगाया गया है। शेष बची 1.5 हेक्टेयर जमीन पर श्री पटेल द्वारा सब्जियों एवं फूलों की खेतीं की जाती हेेेै। श्री पटेल द्वारा कृषि विज्ञान केन्द्र कल्लीपुर वाराणसी के वैज्ञानिकों से सम्पर्क कर सब्जियोें एवं फूलों की खेती के बारे में अपनी उत्सुकता जाहिर की। केन्द्र के वैज्ञानिकों की टीम श्री पटेल के गाॅव जाकर उनके जमीन को देखा उन्हें ग्लेडूलस एवं रजनीगंधा की खेती के लिए सलाह दी। इसके अलावा उन्हे बैंगन, मिर्च, सब्जी मटर, कुन्दरू के अलावा अमरूद के बाग में हल्दी एवं सूरन की सहफसली खेती की जानकारी दी। इस बारे में श्री पटेल को केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा तकनीकी जानकारी प्रशिक्षण एवं प्रर्दशन के माध्यम से दी गयी। बागों में अन्तराशस्य फसल लेने से दोनोें फसलों को उर्वरक, सिचाई निकाई, गुड़ाई इत्यादि का लाभ मिलता है एवं बाग के पौधों की कटाई की वजह से नई शाखायेे पनपती है। जिससेें फल का उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में सुधार आता है। जबकि परम्परागत खेती करने मेें कटाई-छटाई इत्यादि पर कम ध्यान दिया जाता है। पौधो की शाखायें आपस मेें एक दूसरे पौधो ंको छुती रहती है। जिससें सूर्य का प्रकाश नीचे जमीन पर कम पहुँचा जाता है जिसकी वजह से नीचे जमीन

पर खरपतवार व कीट व्याधि इत्यादि का खतरा बराबर बना रहता है उर्वरक प्रबन्धन व अन्य शस्य क्रियायें आसानी से नही हो पाती है जिससें फल उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों कम हो जाती है।

अन्तरःशस्य फसल को बाग के अन्दर करने से कम ही समय मंें एक ही जमीन से साल मेें एक साथ दो फसलों का उत्पादन मिल जाता है तथा मजदुरी, उर्वरक मजदुरी, उर्वरक प्रबन्धन सिचाई एक साथ हो जाने के कारण खर्च कम होता है तथा आमदनी अधिक प्राप्त होती है। श्री शिवशंकर पटेल द्वारा अमरूद के बागों में अन्तराशस्य फसल के रूप मेें ग्लेडूलस की खेती में हुई अतिरिक्त आमदनी (1.96 लाख) से क्षेत्र के अन्य कृषक भी प्रेरणा लेकर रजनीगंधा, ग्लेडूलस सूरन, हल्दी इत्यादि की खेती कर रहे है इस तरह श्री शिवशंकर पटेल का यह प्रयास सराहनीय है।

विकसित तकनीकी अपनाने पर परिणाम में आये सुधार का विवरण:

क्र. स. विकसित तकनीकी परम्परागत तकनीकी
1 ग्लेडूलस के प्लांटिग मैटेरियल पर कुल खर्च प्रति हे रू. 50000.00 / रू. 3.00/बल्ब रू. 1.50 लाख
2 उर्वरक एवं मजदूरी पर खर्च 50 हजार
3 आय 50000.00 स्पाइस के बिक्री पर / रू. 4.00/स्पाइस 02 लाख
द्वितिय वर्ष विगत वर्ष में उत्पादन तकनीकी
4 उर्वरक एवं मजदुरी पर खर्च 50 हजार
5 आय 50000.00 स्पाइस के बिक्री पर / रू0 4.00/स्पाइस 02 लाख
6 20000 बल्ब की बिक्री पर रू0 2.00 /बल्ब 40 हजार अमरूद फल उत्पादन (04 वषों में)
7 दो वर्षोे का कुल खर्च 1.5 लाख, 50 हजाऱ, 50 हजार त्र 2.50 लाख फल उत्पादन - 205 कुन्तल
8 दो वर्षो का कुल आय 2 लाख, 2 लाख, 40 हजार त्र 4.40 लाख कुल आय - 2.46 लाख, कुल खर्च - 50 हजार
9 शुद्व लाभ 4.40 - 2.50 त्र 1.90 लाख 1.96 लाख

Success Story : 2

जीरो टिल तकनीकी द्वारा जलभराव क्षेत्र मं गेहूँ की बुवाई की सफलता की कहानी

कृषक का नाम : श्री हरवंश सिंह

गाॅव का नाम : मधुकरशाहपुर

विकास खण्ड : अराजीलाइन, वाराणसी

जनपद : वाराणसी

विकसित तकनीकी का उपयोग :

वाराणसी जनपद के विकास खण्ड अराजीलाइन के एक प्रगतिशील कृषक है श्री हरवंश सिंह, इनके पास कुल 7.6 हेक्टेयर का प्रक्षेत्र है, जिससे 1..4 हेक्टेयर जल भराव वाला, बलुई दोमट मिट्टी का क्षेत्र है, जिसमे इनके द्वारा धान, गेहूँ अरहर,मंूग,उर्द इत्यादी की फसल का पैदावार किया जाता है। श्री सिंह उक्त जल भराव जमीन से जिसके देरी से तैयार होने की वजह से कोई फसल नही ले पाते थे। श्री सिंह ने कृषि विज्ञान केन्द्र, कल्लीपुर वाराणसी से इस सन्दर्भ में सम्पर्क किया तो के0वी0के0 वैज्ञानिको ने उन्हे जीरो टिल मशीन द्वारा गेहूँ की बुआई करने की सलाह दी। इसके लिए श्री सिंह को केन्द्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण,गोष्ठ इत्यादी में शमिल होने की सलाह दी गयी, पूरी तैयारी के बाद श्री सिंह इस तकनीकी को अपनाने को तैयार हुए। इस तकनीकी से घास व गेहूँ के मामा का प्रबन्ध काफी आसान होती है। जीरो टील ड्रिल मशीन द्वारा गेहूँ की बुवाई करने पर काम लागत में अधिक पैदावार होने से अधिक आमदनी प्राप्त हुई एवं जल व ईधन के खपत में भी कमी आयी। खरपतवार प्रबन्धन से उत्पादन में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि हुई। बीज की गुणवत्ता परम्परागत ढ़ग से खेती के अपेक्षाकृत अधिक अच्छी रही एंव बीज खरपतवार से मुक्त रहा। कृषि विज्ञान केन्द्र, कल्लीपुर वाराणसी की इस तकनीकीर की वजह से कृषि को लाभ हुआ। श्री सिंह द्वारा जीरा टिल ड्रिल तकनीकी द्वारा गेहूँ की बूवाई जलभराव वाले क्षेत्र में करने एंव अधिक पैदावार पाने से प्ररित होकर इस गाँव के आस-पास रहने वाले कृषक भी प्रेरणा लेकर जीरो टिल तकनीकी को अपनाने लगे। आज इस क्षेत्र में लगभग 280 एकड़ के गेेहूँ की बुवाई जीरो टिल ड्रिल तकनीकी से की जा रही है।

विकसित तकनीकी अपनाने पर परिणाम में आये सुधार का विवरण:

क्र. स. विकसित तकनीकी परम्परागत तकनीकी
1 उत्पादकता / हे. 33.50 कु. /हे. 28.75 कु. / हे.
2 कुल खर्च/हे. रू. 5650.00 रू. 8500.00
3 कुल आय/हे. रू. 40200.00 रू. 34200.00
शुद्ध लाभ/हे. रू. 34550.00 रू. 25700.00
4 प्राकृतिक संशाधनो का संरक्षण कम सिचाई कम ईधन खपत ज्यादा सिंचाई,ज्यादा ईधन की खपत
5 उत्पादकता के गुणवत्ता में सुधार खरपतवार व गेहूँ के मामा के उचित प्रबन्धन के कारण, उचित समय पर बुवाई एवं बीज के नीचे खाद के उचित प्रबन्धन के कारण दाने मोटे एवं चमकदार। इस तकनीकी से तैयार बीज खरपतवार से मुक्त रहता है देर से एवं छिटकवा विधि से बुवाई के कारण खरपतवार नियन्त्रण में अधिक लागत एवं बीज में खरपतवार व गेहूॅ के मामा के मिश्रण की सम्भावना अधिक रहती हेै।

Success Story : 3

Floriculture is an important source of income for farmers/ rural Youth

Name of the Farmer :Shri Durga Prasad s/o Late Shri Murli Dhar

Village : Pillori

Block :Arazi Line

District :Varanasi

Size of land Holding : 04 Ha

Shri Durga Prasad S/o Late Shri Murli Dhar belongs to village of Arzi Line block of Varanasi district. He had 4 ha land in which he grown paddy, wheat and some vegetables etc. He was not satisfied from his Income. He worked hard in the field but not got good return. He came to KVK, Varanasi in 2006-07 and showed interest in flower cultivation.

KVK intervention : The KVK, scientist discussed him thoroughly and suggested to change his cropping pattern. He was suggested to grow rose in his field. It was a tough job for the KVK scientist to change his mind. After a lot of meetings, discussions and motivation he was ready to grow rose. He suggested bringing good quality of planting materials from Puna. He went to Puna and managed good planting materials of rose and grows in his field.

Output : Shri Durga Prasad grow rose variety Happinex in 1 ha land and spend Rs. 1.50 lacks in one year on planting materials, fertilizer and labor management for rose cultivation. First year, he got only Rs. 10,000 income, because plant is not healthy to produce flower. Second year he spend Rs. 80,000 for cultural practices and got income Rs. 3,00,000 to sold 30,000 cut flower.

Outcome : Third year spend Rs. 80,000 more on cultural practices and got return Rs. 3,00,000 to sold 30,000 cut flower.

Impact : After getting good return from rose cultivation, he added it in his farming system. So, the floriculture is an impotance source of good income but also helps in generating the employment to the farmers.

The summary of the expenditure/Return is as follows :

1st Year :

Expenditure on Planting material of rose ( 10,000 plants) @7.00 = Rs 70,000

Expenditure on fertilizers and labor management = Rs. 80,000

Total = Rs. 1,50,000

Return to sold cut flowers (1000)@10.00 = Rs. 10,000


2nd Year :

Expenditure on fertilizers and labor management = Rs. 80,000

Income Sold of 30,000 cut flower @10/Cutting = Rs. 3,00,000


3rd Year :

Expenditure on fertilizers and labor management = Rs. 80,000

Income Sold of 30,000 cut flower @10/Cutting = Rs.3,00,000

Total expenditure in three year = Rs. 3,10,000

Total income in three years = Rs. 6,10,000

Net profit in three years = Rs. 3,00,000

So Shri Durga Prasad now got Rs. 3,00,000 and happy with his family.


Success Story : 4

Gladiolus is an important source of income fdor farmers/ rural youth.

Name of the Farmer : Shri Rama Shankar Patel

Village : Pratappur

Block :Arazi Line

District :Varanasi

Size of land Holding : 04 Ha

Shri Rama Shankar Patel belongs to Pratappur village, Arazi Line block of Varanasi district. He had 6 ha land in which he grow paddy, wheat, vegetables and some medicinal plants etc. He was very keen to adopt new technologhy. He came in contact to KVK, scientist and showed interest in floriculture especially in gladiolus cultivation. He worked hard in the field but not got good return.

KVK Intervention : The KVK, scientist discussed him thoroughly and given him technology how to grow the gladiolus and its marketing. He suggested bringing good quality of planting materials.

Shri Rama Shankar Patel cultivated variety Red Beauty and Archana variety in 1 ha land and spend Rs. 3,00,000 for bulb of gladious in one year and Rs. 50,000 for fertilizer and labor management for gladiolus cultivation.

Output : In first year, he got Rs. 4,00,000 income. Second year he spend Rs. 50,000 for cultural practices and got income Rs. 4,00,000 to sold 30,000 cut flower.

Outcome : Third year spend Rs. 80,000 more on cultiral practices and got return Rs. 3,00,000 to sold 10,000 spikes and 50,000 bulb.

Impact : After getting good return from gladiolus cultivation is not good source of income but also helps in generating the full employment to the farmers.

The summary of the expenditure/Return is as follows :

1st Year :

Expenditure on planting material of gladiolus (1,00,000 bulbs) @ 3 = Rs. 3,00,000

Expenditure on fertilizers and labor management = Rs.50,000

Total = Rs. 3,50,000

Return to sold spikes (1,00,000) @ Rs. 4.0 = Rs. 4,00,000

2nd Year :

Expenditure on fertilizers and labor management = Rs. 50,000

Income Sold of 1,00,000 spikes @ Rs. 4/spikes = Rs. 4,00,000

Income from bulb sale 50,000 bulb @ Rs. 2/bulb = Rs. 1,00,000

Total expenditure and income in two year = Rs. 4,00,000

Total expenditure in two years = Rs. 9,00,000

Net profit in three year = Rs. 5,00,000

So Shri Rama Shankar Patel got Rs. 5,00,000 in two years by gladiolus cultivation and happy with his family.


Success Story : 5

Intercroping of Haldi in guava ordchard

Name of the Farmer : Shri Salendra Raghubanshi

Village : Raghubanshi

Block :Cholapur

District :Varanasi

Size of land Holding : 04 Ha

Crop Grown : Paddy, Wheat Gram, Pea, Tomato etc.

Shri Salendra Ragubanshi S/o Shri Narayan singh belong to villrge Babiyaon, Cholapur block of Varanasi district. He is a farmer of land holding of 4 ha. He genarally had grown crops of paddy, wheat, pea etc. and after that be come to prepare an orchard of Guava. During this he faces a problem of weeds infestation and also loss of income. He wants to increase his income during Guava orchard practice. Keeping this in view, he came to KVK Kallipur, Varanasi and made contect with the Agroforestry scientist. Through KVK he was advised to participate in the training organized by KVK. After then he came to KVK and attend the kisan mela, Ghishies and training regarding inter cropping of Haldi in Guava orchard. He has a guava orchard of 3 ha and he shows his keen interest to cutivate Haldi as intercropping in guana orchard. Observing his interest, scientist of KVK visiting his village and becided to adopt him under programme

KVK Intervention : To increase the productivity and production through intercropping he adoped this practice from the year 2008-09. He cultivates haldi under guava orchard and also installs drip irrigation system. He is a very enthusiastic and always shown his keen interest and visited KVK time to time and also keep contact to upgrade his knowledge. The KVK provided him haldi seed of variety NDH-1. He successfully adopted this practice and he got 7.50 qt seed material, which was again sown in 2009-10 and got 51.0 qt. haldi yield. Now this year 2010-11 he also cultivated haldi in 1 ha and he also promotes other neighbor hoods farmers to adopt this technology.

Output : This year 38 number of framers is going to do this practice. He also takes interest to make a farmers club, through which he can spread this technology to some other nearer villages.

Outcome : Mr. Raghubanshi got a net profit of Rs. 2,80,000.00 by adopting only guava orchard, while in case of intercropping of haldi with guava orchard profit was Rs. 2,20,000.00 with B.C. ratio 0.25 and 4.23 respectively.

Impact : Through this practice he came successful to use the maximum fallow land of orchard as well as by using drip irigation system also increases the quality & quantity of guava crop.